“कहाँ जा रहा हैं हमारा भविष्य”- “बेरोजगारी'”- By- pallavi joshi”sms”

“भूख” ये भूख ही एक ऐसी चीज़ है। जो अच्छे से अच्छे इंसान को बेईमान बना देती हैं। भूख आगे बढ़ने की भूख, कुछ औऱ, कुछ बहुत कुछ, पाने की भूख इस भूख का कोई अंत नहीं ना ही आरंभ है। इसी भूख को हमारी अर्थव्यवस्था ने नाम दिया है “बेरोजगारी” हर भूख, हर पुकार, हर घाव का बस एक ही मरहम है वो है “रोजगार” हर कोई यहाँ हर सुबह बस इसी उमीद से उठता है और भागता है कि शायद आज मेरा दिन है आज मैं आपनी और आपने परिवार की भूख को मिटाने के लिए क़ाबिल हो पाऊँगा। ये बेरोजगारी का जाल जितना सरल दिखाई दे रहा है अंदर से उतना ही जटिल और उलझा हुआ है। औऱ ना जाने कितने युवा, जरूरतमंद इसकी जकड़ में है। दिन- प्रतिदिन यही जाल और जटिल होते जा रहा हैं और इसमें फँसने वाले लोगों का अनुपात भी। बेरोजगारी का ही एक बड़ा साम्राज्य बन गया है। एक डीग्री के लिये हर व्यक्ति अपना समय, उम्र, और पैसा ख़र्च करता है पर क्या उसके अनुसार भी उसको नोकरी मिल पाती है? हमारे देश मे युवाओं की संख्या 54 करोड़ मानी जाती है( 20 वर्ष से कम आयु) जो कि भारत की कुल आबादी का 41% है 30 लाख युवा हर साल ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन करते है। और हर 3 में से 1 बेरोजगार रह जाता है। औऱ यही 2 करोड़ 70 लाख नोकरी की तलाश करते है। जिस रफ्तार से युवा रोजगार हो रहे है उतनी ही रफ़्तार से बेरोजगारी भी बढ़ रही है। एक सर्वे के अनुसार 2018 में ये दर 18.6 million हो गयी है। क्या है इस देश के युवाओं का भविष्य? कहा है?दुःखित बात तो ये है कि हमारे देश मे चौथी पास नोकरी के लिये PHD qualified उम्मीदवार आवेदन कर रहा है। master of philosophy की डिग्री वाला कुली की नोकरी के लिए post graduate मछर मारने वाले कि नोकरी के लिए मजबूर है। युवा देश होने पर गर्व तो बहुत होता है पर उनकी योग्यता के अनुसार काम क्यों नही? जहाँ एक ओर अंतरास्ट्रीय स्तर पर हम हमारे देश को सबसे बड़ा युवा देश घोषित करना चाहते है। वहीं हमारे देश की सपनों की नगरी, “मुंबई ” देश की राजधानी “दिल्ली” जैसे शहर जहाँ प्रतिदिन हजारों युवा आँखों मे सपनें हाथ में डीग्री लिये आते है। कि शायद आज उनके सपने पूरे होगे ओर ना जाने कितने ही युवा के सपने रोज़ टुटते है। जिंदगी ये लड़ाई लड़ते- लड़ते कही ये युवा खुद से ना हर जाये। इस बेरोजगारी का ज्वाला हर युवा के मन में उबल रहा है और डर इस बात का है कि कही ये ज्वाल हमारे देश को ही ना जला दें। अब सवाल ये उठता है कि इन सब का जिम्मेदार कौन है? हमारी शिक्षा प्रणाली ? या देश के वो नेता जो हर साल देश की अर्थव्यवस्था में नये-नये प्रयोग करते है? या ये युवा ख़ुद जो आपना भविष्य इस अर्थव्यवस्था के अंधकार में खोज रहे है? मै आपसे पूछती हुँ क्या है इन सवालों का जबाव? क्या है हमारे देश के युवाओं की प्रतिदिन बढ़ती समस्या का समाधान?

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